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मुर्गीपालन के भयावह पर्दे: वह सब कुछ जो ब्रॉयलर शेड फुटेज से सामने आया

हालिया गोपनीय फुटेज से ब्रॉयलर शेड के भीतर के क्रूर सच सामने आए हैं, जो पशु कल्याण उल्लंघनों, अमानवीय प्रथाओं और उपभोक्ता धोखे को उजागर करते हैं।

द्वारा मीनाक्षी देसाई7 मिनट पठनमुंबई, IN
भारत में ब्रॉयलर शेड के अंदर की अमानवीय स्थिति, जिसमें बीमार और घायल मुर्गियां भीड़भाड़ वाले वातावरण में हैं
VegEco / AI-generated

<b>संक्षिप्त उत्तर:</b> हाल ही में जारी की गई गोपनीय फुटेज ने भारत के ब्रॉयलर शेड के भयानक सच को उजागर किया है, जिसमें मुर्गियों के प्रति क्रूरता, अत्यधिक भीड़भाड़ और बीमारी-सृजन करने वाली परिस्थितियों का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। इन खुलासों से पशु कल्याण उल्लंघनों और उद्योग की अमानवीय प्रथाओं पर गंभीर सवाल उठते हैं, जो उपभोक्ताओं को नैतिक और पौधे-आधारित विकल्पों की ओर धकेलते हैं।

जांचकर्ताओं ने ब्रॉयलर शेड में क्या देखा?

हालिया जांच, जिसे 'कोमल पंख' अभियान के हिस्से के रूप में एक पशु अधिकार संगठन ने संचालित किया, ने भारत के कई ब्रॉयलर फार्मों से भयावह दृश्य सामने लाए हैं। फुटेज में मुर्गियों को भयानक, अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया दिखाया गया है। ये मुर्गियां, जिन्हें उनके मांस के लिए तीव्र गति से बढ़ने के लिए पाला जाता है, अक्सर अपने ही कचरे में रहने को मजबूर होती हैं, जहां अमोनिया के उच्च स्तर के कारण श्वसन संबंधी समस्याएं और त्वचा में जलन होती है। इन छोटे, भीड़भाड़ वाले बाड़ों में हजारों पक्षियों को एक साथ ठूंस दिया जाता है, जिससे बीमारी और तनाव का खतरा बढ़ जाता है।

जांचकर्ताओं ने ऐसे पक्षियों को रिकॉर्ड किया है जो अपनी तेजी से बढ़ती शरीर संरचना के कारण चलने में असमर्थ हैं, जिन्हें उनके भारी शरीर का समर्थन करने में कठिनाई होती है, जिससे वे अक्सर गिर जाते हैं और भोजन या पानी तक पहुंचने में असमर्थ होते हैं। कई पक्षियों में पंखों का झड़ना, घाव और अवशिष्ट अंगों को देखा गया, जो भीड़भाड़ और तनाव के परिणामस्वरूप अक्सर एक-दूसरे को चोंच मारते हैं। बीमारी और मृत्यु दर आम है, और मृत पक्षियों को अक्सर अन्य जीवित पक्षियों के साथ घंटों या दिनों तक छोड़ दिया जाता है, जिससे बीमारी का और प्रसार होता है।

“भारत के ब्रॉयलर फार्मों की ये फुटेज एक दिल दहला देने वाली सच्चाई दर्शाती हैं: कि मानवीयता और पशु कल्याण के सभी सिद्धांतों को मुनाफे के नाम पर त्याग दिया गया है। ये मुर्गियां जीवित प्राणी हैं, संवेदनशील हैं, और वे इससे बेहतर की हकदार हैं।”

डॉ. प्रिया शर्मा, एनिमल वेलफेयर रिसर्च फाउंडेशन

किन कानूनों का उल्लंघन किया गया?

इन ब्रॉयलर शेडों में देखी गई स्थितियां भारत में पशु कल्याण कानूनों के कई उल्लंघनों को दर्शाती हैं, विशेष रूप से 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960' और 'पशु क्रूरता निवारण (उत्पादकता और प्रबंधन) नियम, 2017' के तहत। इन नियमों में पशुओं के लिए पर्याप्त जगह, भोजन, पानी और चिकित्सा देखभाल का प्रावधान शामिल है। फुटेज में दर्शाया गया है कि ये मौलिक आवश्यकताएं अक्सर पूरी नहीं होती हैं।

उल्लंघन की गई प्रमुख कानूनी धाराएं (पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960)

  • धारा 11(1)(ई): किसी भी जानवर को अनावश्यक पीड़ा या दर्द देना।
  • धारा 11(1)(एफ): मालिक द्वारा अपने जानवर को छोड़ देना, जिससे पीड़ा होती है।
  • धारा 11(1)(एच): किसी भी कंटेनर में जानवरों को बंद करना जो उन्हें उचित गतिविधि या गति की अनुमति नहीं देता है।
  • धारा 11(1)(टी): किसी भी क्रूर या अनावश्यक ऑपरेशन की अनुमति देना।
  • धारा 11(1)(बी): उचित भोजन या पानी से वंचित करना।
उल्लंघनदेखी गई स्थितिप्रासंगिक कानूनी अधिनियम / नियम
अत्यधिक भीड़हजारों पक्षी छोटे, बंद बाड़ों में ठूंस दिए जाते हैंधारा 11(1)(एच), पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
अपर्याप्त स्वच्छतापक्षियों को अपने ही कचरे में रहने के लिए मजबूर किया गया, अमोनिया के उच्च स्तरपशु क्रूरता निवारण (उत्पादकता और प्रबंधन) नियम, 2017
चिकित्सा उपेक्षाबीमार या घायल पक्षियों को बिना उपचार के छोड़ दिया गयाधारा 11(1)(बी), पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
पर्यावरण संवर्धन का अभावप्राकृतिक प्रकाश, ताजी हवा, परचिंग या धूल स्नान के लिए कोई प्रावधान नहींपशु क्रूरता निवारण (उत्पादकता और प्रबंधन) नियम, 2017
अमानवीय प्रबंधनमृत पक्षियों को जीवित पक्षियों के साथ घंटों तक छोड़ देनाधारा 11(1)(टी), पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
ब्रॉयलर फार्मों में देखे गए सामान्य उल्लंघन और संबंधित कानूनी धाराएं

पोल्ट्री कंपनियों की प्रतिक्रिया

इन खुलासों के बाद, जिन कंपनियों से ये फुटेज सामने आईं, उन्होंने अक्सर एक समान पैटर्न का पालन किया है। प्रारंभिक इनकार, इसके बाद आंतरिक जांच का वादा, और अंत में सतही बयान जिनमें 'कंपनी की नीतियों' और 'कल्याण मानकों' पर जोर दिया जाता है। हालांकि, इन बयानों के बावजूद, शायद ही कभी कोई वास्तविक परिवर्तन या सार्वजनिक जवाबदेही देखी जाती है। उदाहरण के लिए, एक प्रमुख पोल्ट्री आपूर्तिकर्ता - जो देश भर के सुपरमार्केट में आपूर्ति करता है - ने फुटेज जारी होने के बाद कहा कि वे 'कल्याण के उच्चतम मानकों' का पालन करते हैं, लेकिन यह नहीं बताया कि फिल्माए गए उल्लंघन कैसे हुए।

उद्योग में आम तौर पर वित्तीय निहितार्थों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में जटिलता का हवाला दिया जाता है, जिससे व्यापक सुधारों को लागू करना कठिन हो जाता है। उपभोक्ता के दबाव और सरकारी नियामक निकायों की ओर से सक्रिय कार्रवाई की कमी के कारण, ऐसी घटनाओं को अक्सर कालीन के नीचे धकेल दिया जाता है, और अमानवीय प्रथाएं जारी रहती हैं।

एक उद्योग पैटर्न: क्रूरता की अक्षमता

भारत में पोल्ट्री उद्योग अपनी गहनता और तेजी से विकास के लिए कुख्यात है, जो 'अधिक मांस, कम समय' के आदर्श वाक्य पर चलता है। यह आर्थिक मॉडल अक्सर पशु कल्याण को गौण बना देता है। ब्रॉयलर पक्षियों को केवल 6-8 हफ्तों में उनके वध के वजन तक पहुंचने के लिए नस्ल किया जाता है, जिससे उनकी हड्डियों और अंगों पर भारी शारीरिक दबाव पड़ता है। यह तेजी से विकास पैटर्न शरीर के कई अन्य कार्यों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है, जिसमें हृदय और श्वसन प्रणाली शामिल हैं।

भारत में प्रति व्यक्ति चिकन मांस की खपत (वार्षिक, किलोग्राम)

यह 'कोमल पंख' अभियान अकेला नहीं है। दुनिया भर में और भारत में भी कई संगठन लगातार क्रूरता के इन पैटर्नों का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। ये रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह एक व्यवस्थित समस्या है जो गहन पशु कृषि के व्यापार मॉडल में अंतर्निहित है। मुर्गीपालन उद्योग में, मुर्गियों को अक्सर वस्तुओं की तरह माना जाता है, न कि संवेदनशील प्राणियों की तरह। यह मानसिकता ही इन अमानवीय परिस्थितियों को बनाए रखती है।

उपभोक्ता क्या कर सकते हैं?

इन खुलासों के आलोक में, उपभोक्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे खरीद निर्णय इस उद्योग के भविष्य को आकार दे सकते हैं। चिकन उत्पादों की मांग कम करके, हम सीधे फैक्ट्री फार्मों को पैसा देना कम करते हैं, और नैतिक विकल्पों की ओर बाजार को धकेलते हैं।

आपकी दैनिक आदतें कैसे मदद कर सकती हैं:

  • <b>पौधे-आधारित आहार अपनाएं:</b> चिकन और अन्य पशु उत्पादों की खपत को कम करें या समाप्त करें।
  • <b>सूचित रहें:</b> पशु कृषि के बारे में अधिक जानें और दोस्तों और परिवार के साथ जानकारी साझा करें।
  • <b>नियमों की मांग करें:</b> भारत सरकार से पशु कल्याण कानूनों को मजबूत करने और लागू करने का आग्रह करें।
  • <b>जानवरों की वकालत करने वाले संगठनों का समर्थन करें:</b> जैसे पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया या फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशंस (FIAPO), जो जांच और अभियान चलाते हैं।
  • <b>जागरूकता बढ़ाएं:</b> सोशल मीडिया पर या व्यक्तिगत रूप से इन मुद्दों के बारे में बात करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या भारत में ब्रॉयलर फार्मों को नियंत्रित करने वाले कोई नियम हैं?

हां, भारत में पोल्ट्री फार्मों को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशु क्रूरता निवारण (उत्पादकता और प्रबंधन) नियम, 2017 जैसे विभिन्न कानूनों और नियमों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। हालांकि, समस्या अक्सर प्रवर्तन की कमी और इन नियमों के व्यापक पैमाने पर उल्लंघन में निहित होती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) भी मांस उत्पादन के लिए कुछ स्वच्छता और सुरक्षा दिशानिर्देश निर्धारित करता है।

क्या ब्रॉयलर चिकन का सेवन मेरे स्वास्थ्य के लिए खराब है?

सेवन किए जाने वाले ब्रॉयलर चिकन का स्वास्थ्य पर प्रभाव कई कारकों पर निर्भर करता है, जिसमें पक्षी के पालन की स्थिति, उपयोग किए गए एंटीबायोटिक और हार्मोन, और उसकी समग्र स्वच्छता शामिल है। फैक्ट्री फार्मों में पाले गए चिकन में अक्सर एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया का खतरा अधिक होता है, और इसमें कोलेस्ट्रॉल और संतृप्त वसा भी अधिक हो सकती है। विशेषज्ञ हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए पौधे-आधारित प्रोटीन और फाइबर में उच्च आहार की सलाह देते हैं।

क्या शाकाहारी चिकन विकल्प सच में स्वस्थ हैं?

कई शाकाहारी चिकन विकल्प प्रोटीन, फाइबर और आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ-साथ संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल में कम होते हैं, जो उन्हें पारंपरिक चिकन का एक स्वस्थ विकल्प बनाते हैं। हालांकि, सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी के लिए लेबल की जांच करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ संसाधित विकल्प सोडियम में उच्च हो सकते हैं।

मैं कैसे सुनिश्चित कर सकता हूं कि मैं नैतिक रूप से उत्पादित चिकन खरीद रहा हूं?

नैतिक रूप से उत्पादित चिकन ढूंढना मुश्किल है, क्योंकि 'फ्री-रेंज' या 'देशी' जैसे लेबल हमेशा पशु कल्याण की गारंटी नहीं देते हैं। सबसे विश्वसनीय तरीका उन प्रमाणीकरणों की तलाश करना है जो कठोर कल्याण मानकों को पूरा करते हैं, हालांकि भारत में ये दुर्लभ हैं। अंततः, पशु क्रूरता से बचने का सबसे निश्चित तरीका पौधे-आधारित विकल्पों का चयन करना है।